Monday, June 11, 2012

कशमकश का एक अंतहीन सिलसिला------ हमारा मन

Emptiness/vacuum (called Shunya in Hindi) is one such authority on whose surface if we stand and introspect ourselves then we will not see anything other than inner filth which is permanent….and how can it be? Greed and delusion have become indispensable part of our life…….We want all the things which we love, with which we have infatuation ,may it be our social relations or spiritual….Generally it is said that we remember our Sadgurudev so much! We feel his absence very much! but it is not like this since only those are remembered which we have forgotten and likewise absence of only those are felt who have left us and gone far off…and our loved ones, if in reality they and we are part of each other respectively then ,this principle does not apply.
Like truth and lie , coin of soul have also got two sides and their base i.e. our soul  or in other words, our inner consciousness is immortal and undecaying and if understood in simple words, where there is life, death is also there….and ignoring this supreme truth we indulge in “selfish tendencies” and ignore the existence of supreme authority whose consequences are…..all the time we feel insecure, not able to concentrate in any work, always have apprehension of happening of seeming impossible event and such type of so many apprehensions which are impossible to count……and behind it , the reason is only one …………our Mind!!!!! (Called Man in Hindi).which works completely under control of itself.
Our mind has got an amazing control over our sadhna-centric thinking…..According to it, we sit for sadhna also and also get up. This only makes us feel that now legs have started paining .I should get up now but the situation become dangerous when rather than us, it becomes our master and then our fixed program commences…..imploring before the supreme authority and in such a state ,what we say, we bind ourselves in so many promises towards authority of god, we ourselves do  not know……and then as our mind become calm then all the things remain as it is.Then they hardly exist at all ,they become past and we forget this thing that “Nature is one such stage on which if we  thought of doing something in our thoughts only, then you doing it or not doing it will affect only at materialistic level because this thing would have already happened in universe just as result of your thinking….”
Result will come as they have to come but this type of feeling destroys peaceful arrangement of our inner consciousness completely. As a result again that fixed work-pattern continues but no improvement whatsoever. This is little bit bitter but true to that extent also. We all do like this only. But where there is problem, there is solution too. But the need is only to manifest it.As we control our mind, immediately after it the path of sadhna slowly becomes simpler. Then neither fear worries us or the feeling of insecurity. What is left behind is just ever-lasting peace, which in itself is no less than precious treasure because Master always taught “The day mind becomes peaceful, that day god himself will start residing in your soul”. Because where there is unrest, divine souls remains quite far away from that place…..
Controlling mind is not that much easy and not that much difficult. Just we have to give place to unselfish felling, trust and imploring has to be stopped out rightly. Sadgurudev always used to say that every moment, being troubled with guilty feeling; the weeping ones can’t be disciples of me. Therefore, to save ourselves from being compelled by mind and for making mind peaceful in sadhna, just you have to do this small prayog with full dedication…..Then you will see how you will feel Sadgurudev inside you every moment at every place.
This sadhna can be done on any Monday. After doing Guru Poojan and Guru Mantra, you have to chant only 11 rounds of this mantra. Direction will be north and dress will be white. You can use the same aasan and rosary which you use it for daily worship.
There is no need of any sadhna article or any special yantra. Only and only Guru Picture is needed. Before starting sadhna, pray to Sadgurudev for success in sadhna .In order that your sadhna is completed without hurdles, get the blessings of Lord Ganpati. If you want you can offer flowers to Sadgurudev when doing guru poojan and if possible, can offer any pure food as Bhog to him.
Note: Like every time, I would like to repeat the thing told by my master that mantra given in these sadhnas are in chetan state .Therefore, after completing sadhna, if possible daily or after gap of some days, sadhak should activate the sadhna mantra again and again according to his own capacity so that there is coordination between you and power of that mantra.
Nikhil Pranam

शून्य एक ऐसी सत्ता है जिसके धरातल पर खड़े हो कर यदि आंतरिक मनन किया जाए तो सिवाय आतंरिक गंदगी के हमें और कुछ भी ऐसा नहीं दिखेगा जो स्थाई हो.....और होगा भी कैसा? लोभ और मोह हमारे जीवन के अभिन्न अंग जो बन चुके हैं.....हमें हर वो चीज चाहिए जिसे हम प्यार करते हैं, जिससे हमें मोह है फिर भले वो हमारे सामाजिक रिश्ते हो या आध्यात्मिक.....अक्सर यह कहा जाता है की हम सदगुरुदेव को बहुत याद करते हैं! उनकी कमी बहुत अखरती है! पर ऐसा नहीं है क्योकि याद उसे किया जाता है जिसे हम भूल चुके होते है और इसी प्रकार कमी उसकी महसूस होती है जो हमें छोड़ कर कहीं दूर चला गया हो....और हमारे प्रियजनों पर, यदि वो सच में हमारा और हम उनका हिस्सा हैं तो, यह सिद्धांत लागू नहीं होता.
 सच और झूठ की तरह ही आत्मा रुपी सिक्के के दो पहलू हैं और इनका आधार अर्थात हमारी आत्मा या यूँ कहें की हमारी अन्तश्चेतना अजर अमर है.....और सरल शब्दों में समझें तो जहाँ जीवन है वहाँ मृत्यु भी अवश्य होगी....और इसी परम सच को नकार कर हम “ स्वार्थी प्रवृत्तियों “ में फसे रह कर उस परमसत्ता के अस्तित्व को नकार देते हैं, जिसका नतीजा होता है....हर समय अपने आप को असुरक्षित महसूस करना, किसी भी काम में दिल न लगना, हमेशा एक अनहोनी के घटित होने की आशंका होना और ऐसी कितनी ही हाजारों लाखों आशंकाएं जिन्हें गिन पाना असम्भव है....और इस सब के पीछे कारन केवल एक ही होता है--- हमारा मन!!!!! जो पूर्णता: स्व के वशीभूत होकर कार्य करता है.
 हमारे साधनात्मक चिंतन पर हमारे मन का गज़ब नियंत्रण हैं....इसीके अनुरूप हम साधना करने बैठते भी है और उठ भी जाते हैं. यही हमें एह्साह करवाता है की अब पैर दुखने लगे हैं अब मुझे उठ जाना चाहिए पर यह स्थिति ज्यादा खतरनाक तब हो जाती है जब हम नहीं बल्कि यह हमारा स्वामी बन जाता है और फिर हमारा एक निर्धरित कार्यक्रम चालू हो जाता है----उस परमसत्ता के आगे गिडगिडाने का और इस स्थिति में हम क्या-क्या कहते हैं, खुद को ईश्वरीय सत्ता के प्रति किन-किन वचनों में बाँध देते हैं हम स्वयं भी नहीं जानते....और फिर जैसे ही मन शांत हुआ तो सारी की सारी बातें धरीं की धरीं रह जाती हैं, फिर उनका कोई अस्तित्व भी नहीं रह जाता, वो अतीत बन जाती हैं और हम यह बात भूल जाते हैं की “ प्रकृति एक ऐसा मंच है जिस पर यदि हमारे ख्याल में भी किसी कार्य को करने का ख्याल आया तो समझ लो अब आपके द्वारा उस कार्य को करने या ना करने से सिर्फ भोतिक स्तर पर अंतर आएगा क्योकि ब्रह्मांड में तो मात्र आपके सोचने से ही वो घटना घट चुकी होती है...” 
परिणाम तो जो आना है वो आएगा ही मगर इस तरह की भावना हमारी अन्तश्चेतना की शांति व्यवस्था को पूरी तरह से तहस-नहस कर देती है नतीजन फिर वही निर्धारित क्रिय्क्लाप चालु J पर सुधार कहीं नहीं. बात थोड़ी सी कड़वी है पर उतनी ही सच भी, हम सब यही तो करते हैं.
 मगर जहाँ समस्या हो वहीँ समाधान भी होता है बस जरूरत होती है उसके द्रष्टिगोचर होने की! जैसे ही हमने अपने मन पर नियंत्रण कर लिया, बस उसके तुरंत बाद साधनात्मक मार्ग धीरे-धीरे सुगम होने लगता है, फिर ना तो कोई भय सताता है और ना ही असुरक्षा की भावना, बस पीछे रह जाती है तो केवल एक चिरस्थाई शान्ति, जो अपने आप में किसी बहुमूल्य खजाने से कम नहीं क्योकि मास्टर हमेशा समजाते हैं,” जिस दिन मन शांत हो जायेगा उस दिन ईश्वर अपने आप तुम्हारी आत्मा में वास करने लगेंगे “ क्योकि जहाँ अशांति होती है वहाँ से पुण्य आत्माएं कोसों दूर रहती है...
 मन रूपी घोड़े पर लगाम लगा पाना इतना सहज भी नहीं है और उतना कठिन भी नहीं बस अपने अंदर निस्वार्थ भाव के साथ साथ विश्वास को स्थान देना होगा और गिडगिडाना तो बिलकुल ही बंद करना होगा. सदगुरुदेव भी तो हमेशा कहते हैं की हर पल आत्म-गिलानी में ग्रस्त होकर रोते रहने वाला मेरा शिष्य कदापि नहीं हो सकता तो खुद को मन के हाथों विवश ना होने से बचाने के लिए और साधना में चित्त को शांत रखने के लिए आपको केवल इस छोटे से प्रयोग को पूरी निष्ठा और लग्न से करना है....फिर देखिये कैसे आप सदगुरुदेव को अपने अंदर हर पल, हर जगह महसूस करेंगे.
 मंत्र –


ओम सोमेश्वराय पूर्ण मनसविताय सिद्धिम ह्रीं ओम

इस साधना को आप किसी भी सोमवार को कर सकते हैं. गुरुपूजन और गुरुमंत्र करने के बाद आपको इस मंत्र की मात्र ११ माला सुबह के समय करनी हैं. आपकी दिशा उत्तर होगी और आपको सफेद वस्त्र पहन कर इस साधना को करना है. माला या आसान आप वही उपयोग कर सकते हैं जिस पर बैठ कर आप नित्य पूजा करते हैं.
किसी सामग्री या यंत्र विशेष की कोई आवश्कता नहीं है केवल और केवल गुरुचित्र ही चाहिए. साधन शुरू करने से पूर्व सदगुरुदेव के सामने सफलता के लिए प्रार्थना करें और साधना निर्विघ्न सम्पन्न हो इसके लिए भगवान गणपति का आशीर्वाद लें. आप चाहें तो गुरुपूजन करते समय सदगुरुदेव को पुष्प अर्पित कर सकते हैं और यथा सम्भव किसी भी सात्विक आहार का भोग लगा सकते हैं.
नोट- मैं हर बार की तरह इस बार भी अपने मास्टर द्वारा समझाई हुई बात यहाँ दोहराना चाहूंगी की इन साधनाओं में आपको दिए जाने वाले मंत्र चेतन अवस्था में होते हैं, इसीलिए साधना सम्पन्न करने के बाद हो सके तो हर रोज अन्यथा कुछ दिनों के अंतराल से की गयी साधना के मंत्र को सामर्थ्य के अनुसार फिर बार बार जाग्रत करते रहना चाहिए जिससे की आपका और उस मंत्र शक्ति का सामंजस्य बना रहे.
निखिल प्रणाम


Dinesh Paliwal said...

Jai Sadgurudev,

Rozy Bahin ji, namashkar

Is mantra ka jap kiya to aisa mahsus hua ki aakho se 1.5 inch upside and 3 inch inside koi vastu jiska figure varnamala ke 7ve aksher herrim ya string ke jaisa hai (bar bar uski akriti badal rahi hai)aur uske back me horizontaly 5 ya 7 pardarshi gole hai ye sab aage bharukiti ki aur uda rahe hai.
mera man zor se hasne ko kar raha tha.
mujhe feel hua ki mera man mera nahi raha,
jaise mere man ko meri chintao se koi lena dena nahi hai,
vah eak alag tatva ya sahi kahun to padrath ke roop mai hai.

yeh sab likhne sai pahle maine dus bar socha ki likhoon ki nahi per likh hi diya.

Waiting and always waiting for mantra, tantra, yantra ghyan.

Jai Sadgurudev.

Unknown said...

priy bhai dinesh ji , jo sadhana karta hain use anubhav hona ek swabhavik si prakriya hain aap ne is sadhana ke madhyam se safalata paayi han ya is prayog ko saflatapurvak kiya iske liye aap ko badhayi.

Dinesh Paliwal said...

Sweet Anu Bhaiya ji Thanks.

Jai Sadgurudev