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Friday, June 29, 2012

ROG NIVAARAK SINHMUKHI PRATYANGIRA SHAKTI PRAYOG


मनुष्य ब्रम्हांड की एक अद्भुत रचना है, जिसे जितना भी समजा जाए उतना ही कम लगता है. आधुनिक विज्ञान तो मनुष्य के कुछ ही हिस्सों तक पहोचा है और इस क्षेत्र में पूर्ण रूप से अपनी शोध को गतिशील बनाये हुवे है. हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने भी इसी दिशा में शोध कार्य किया था और शरीर से सबंधित कई प्रकार के गोपनीय तथ्यों के बारे में अपनी तपस्या से पता लगाया था. मनुष्य शरीर एक अत्यधिक जटिल रचना है, यह ठीक एक यंत्र की तरह है जिसमे कई प्रकार के पुर्जे होते है और कोई भी एक पुर्जा खराब होने पर पूरा यंत्र खराब हो जाता है. हमारा शरीर स्वस्थ हो तब हमारा जीवन स्वस्थ है और हमारा शरीर अपनी गितिशिलता के अनुरूप कार्यशील रहेगा. लेकिन जब यह कार्य में रुकावट आती है तो कई प्रकार की समस्याओ का सामना करना पड़ता है. ये रुकावट को या फिर यह गतिशीलता में शरीर को जो बाधा प्राप्त हो रही है उसे ही रोग कहते है. रोग मनुष्य को मात्र बाह्य या शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी तोड़ देता है तथा जीवन के क्रियाकलाप में विक्षेप का प्रसार करने लगता है. आज के युग की चिकित्सा पध्धति मात्र बाह्य लक्षणों की तरफ ध्यान देती है लेकिन मानसिक रूप से जो क्षति पहोचाती है तथा जो सूक्ष्म भाग और शरीर के अंदर के अन्य शरीर तथा तत्वों पर जो क्षति होती है उस की क्षति पूर्ती करना अत्यधिक कठिन कार्य होता है और इसी लिए कई बार कई प्रकार के रोग उत्तम चिकित्सा लेने पर भी पूरी तरह मिटते नहीं और कई बार होते है. तंत्र क्षेत्र के कई अद्भूत विधान है जिसके माध्यम से रोगों से मुक्ति पा कर एक सम्पूर्ण जीवन को जिया जा सकता है. ऐसे दुर्लभ विधानों के माध्यम से जहा एक और रोग और रोगजन्य कष्ट और पीड़ा से मुक्ति मिलती है वहीँ दूसरी और जो क्षति हुई है उसकी भी पूर्ति होती है जिससे भविष्य में वह रोग के लक्षण नहीं होते है. ऐसा ही एक दुर्लभ विधान देवी प्रत्यंगिरा से सबंधित है. यह प्रयोग श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो रोग के कष्ट से निश्चित रूप से व्यक्ति को मुक्ति दिला सकती है. 
यह प्रयोग रविवार रात्री काल में ११ बजे के बाद शुरू किया जा सकता है.
साधक के वस्त्र और आसान लाल रंग के हो. साधक को उत्तर दिशा की तरफ मुख कर बैठना चाहिए.
साधक अपने सामने देवी प्रत्यंगिरा का चित्र या यन्त्र स्थापित करता है तो उत्तम है लेकिन यह संभव ना हो तो भी साधक मंत्र का जाप कर सकता है. साधक सर्व प्रथम हाथ में जल ले कर संकल्प करे की मेरे सभी रोग शोक दूर हो इस लिए में यह प्रयोग सम्प्पन कर रहा हू. देवी मुझे आशीष और सहायता प्रदान करे. अगर साधक किसी और व्यक्ति के लिए मंत्र जाप कर रहे हो तो संकल्प में उस व्यक्ति का नाम उच्चारित करे. इसके बाद साधक मानसिक रूप से पूजन सम्प्पन करे तथा मूंगा माला से निम्न मंत्र की २१ माला जाप करे.
ॐ सिंहमुखी सर्व रोग स्तंभय नाशय प्रत्यंगिरा सिद्धिं देहि नमः
मंत्र जाप के बाद साधक देवी को नमस्कार करे और कल्याण करने की प्रार्थना कर सो जाए. साधक को यह क्रम ११ दिनों तक करना चाहिए. साधना समाप्ति पर साधक यन्त्र चित्र आदि को पूजा स्थान में स्थापित कर दे और माला को किसी को देवी मंदिर में दक्षिणा के साथ अर्पित कर दे तो रोग शांत होते है तथा पीड़ा से मुक्ति मिलती है. अगर साधक कोई चिकित्सा ले रहा हो या औषधि ले रहा हो तो यह प्रयोग करते वक्त उसे बंद करने की ज़रूरत नहीं है. साधक अपनी चिकित्सा के साथ ही साथ यह प्रयोग को कर सकता है इसमें किसी भी प्रकार का कोई दोष नहीं है.

Human is great creation of the universe that whatever we understand it remains always less. Modern science reached to very limited parts of the body and in this direction their research keeps on going. Our ancient sages too made their research in this direction and many secrets related to the body were been revealed by them with the help of their ancient systems of the worships.
Human is very complicated structure, this is like a machine which owns many parts and any of the part belonging this yantra if get damage then machine does not work properly. When our body is healthy, our life will remain active with its power of continuity. But when this function gets any obstacle then many troubles comes in the way. These obstacles of the body are called as diseases. Disease creates troubles not only in the outer body but it also affects in the mind functioning and it troubles in day to day functioning of the life. Today, treatment methods only focuses on the outer symptoms and troubles but it is also difficult task to recover the loss and damages made in the mind and on the elements of micro or astral parts or the inner bodies. That is why after taking proper treatment too many diseases doesn’t vanishes and appears again and again.  In tantra field there are so many miraculous processes which may give relief from the diseases and one can live life completely. With such rare processes one may have relief of sufferings of the pain caused by diseases and on the other hand it also recovers the deficiency and the damages caused in the body thus to prevent body to develop the disease again. One of such process is related to Devi Pratyangira. If this process is done with faith and devotion then for sure human being can have complete freedom from the diseases.
This process should be started on Sunday night after 11 PM
Cloths and sitting mat of the sadhak should be Red in color. Sadhak should sit facing north direction.
It is better if sadhak establish yantra or picture of devi pratyangira in front of him but if that is not possible one may do mantra chanting without it too. By taking water in the palm sadhak should first do the sankalp that ‘I am doing this prayog to remove all my diseases and troubles. Goddess may please bliss and help me.’ If sadhak is doing this process for someone else then one should speak name of that particular person in the sankalpa for whom the process is being carried out. After this, sadhak should do poojan mentally and with Mungaa Rosary one should chant 21 rounds of the following mantra.
Om SinhMukhi Sarv Rog Stambhay Naashay Pratyangiraa Siddhim Dehi Namah
After mantra chanting is done sadhak should bow to the goddess and should pray for her blessings. Sadhak should do this process for 11 days. When sadhana is completed one should place yantra and picture in the worship place and rosary should be placed in goddess temple with some offerings. This results in relief in the diseases and freedom from the pain caused by the same. If sadhak is taking medication in the sadhana duration then it is not essential to stop it. Sadhak can do this prayoga with regular medication or the treatment. This causes no faults in the sadhana.

****NPRU****

2 comments:

MUKESH SAXENA said...

aisi ek sadhna ki bahut zarurat thi.kyonke swasth rahenge to hi sadhna kar payenge.ATI UTTAM SADHNA PRAYOG.
iske liye koti koti naman.

muskaan said...

really impressv sadhana...
i wana commence it frm this sunday..
kindly help.. wana ask u a few questios regading it :)