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Monday, June 11, 2012

सप्त ऋषि पूंजीभूत तत्व शक्ति साधना



Human body, copy image of outer world is one universe and accordingly north and south poles are also present in human body which conducts positive and negative energy of electromagnetism. Brain has been considered as North Pole and Muladhaar has been considered as South Pole. Between them there are Muladhaar, swadhisthan, Manipur, Anahat, Vishudha, aagya and Sahastrar chakra. In other words, if Muladhaar is situated on one end then sahastrar is situated on other end and exchange of that divine power takes place through Sushumana situated in spinal cord. Path of Sushumana after purifying these powers perform mutual exchange of Shakti at both ends. The seven chakras which we have mentioned, are actually representative of Sapt Rishis (Seven Great saints).In other words, in these chakras, elements of these rishis illuminates. Externally, they may be rishis, actually they are those seven powers and seven elements which provide capability to complete various activities in orderly way .These bhaav, these elements acquire the praan from sun only and then only life become available. Now it all depends on sadhak that how intensely he can utilize the above-mentioned seven powers (which get praan from sun and then provide brightness and vibrancy to sadhak). First of all, let’s understand that who are these Sapt Rishi actually and which power they represent.
Vasisht - Fire element - Vivek Shakti (Power to apply brain and take correct decisions)
Vishwamitra – Sky Element – Ichha Shakti (Will power)
Bhardwaj – Conscious Element –Sankalp Shakti (Resolution Power)
Gautam –Vayu element –Vichaar Shakti (Thought power)
Jamdagni –Tej Element –Kriya Shakti (Power of doing)
Atri –Water element –Vaani Shakti (Power of speech)
Kashyap –Earth element – Uthaan Shakti (Power to progress)
In Reality these Sapt Rishis only are the seven bodies of human beings and those seven loks of universe which have been called Bhu, Bhvah, Swah, Manah, Janah, Tapah and Satya lok. These are those seven possibilities present in human body which if activated by anyone, then nothing will be unattainable for him. Actually, these are seven layers of consciousness present in human body which can make any impossible task possible. One more thing worth imbibing is that if taken help of tantra, attaining these seven levels of consciousness becomes simpler. Actually sadhaks of Surya Vigyan or those who are curious to know it have to complete one full sadhna cycle to imbibe this secret and attain proficiency in it.But by adopting normal process also, we can not only vibrate chakras of kundalini but also imbibe the vibration of consciousness of the Sapt Rishis in our life, can write our fate on our own and can remove misfortune completely and attain serenity and radiance.
You can start this sadhna on any Sunday and when after taking bath, you offer water to sun then before it pronounce below mentioned mantra 108 times while looking at water-container. Then only offer water to sun while chanting “Om   Tejsvitaay   Namah”.
Basic Mantra:
Om  Surya  Suryaay  Surya  Saprishibhyo  Sah  Chaitanya  Praptum  Poorn  Tejsvitaay  Namah
Actually this mantra has been devised in such a way that if it is used according to rules mentioned above then definitely it can completely remove your misfortune.

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बाह्य जगत की प्रतिकृति ये मानव शरीर भी एक ब्रम्हांड ही है और तदनुसार मानव शरीर में भी उत्तर और दक्षिण दो ध्रुव विराजमान हैं.जिनमे विद्युत चुम्बकत्व की धनात्मक और ऋणात्मक शक्ति प्रवाहित रहती है, मष्तिष्क को उत्तरी ध्रुव और मूलाधार को दक्षिण ध्रुव माना गया है. इन्ही के मध्य मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध ,आज्ञा और सहस्रार चक्र हैं. अर्थात मूलाधार यदि एक छोर पर स्थित है तो सहस्रार दूसरे छोर पर स्थित है.  और उस दिव्य शक्ति का आदान प्रदान मेरु दंड में स्थित सुषुम्ना सूत्र के द्वारा होता है.
सुषुम्ना पथ ही इन शक्तियों को परिष्कृत कर दोनों छोरो पर शक्ति का परस्पर आदान प्रदान करता है. जिन चक्रों की हमने बात की है .वे ७ चक्र वस्तुतः सप्त ऋषियों के प्रतिनिधि हैं. अर्थात इन चक्रों में इन ऋषियों का ही तव प्रकाशित होता है, बाह्य दृष्टि से जो ऋषि हैं, वास्तव में वो सात शक्तियां और सात तत्व भाव हैं, जो जीवन के विभिन्न क्रिया कलापों को सुचारू रूप से संपन्न करने की क्षमता प्रदान करते हैं. और ये भाव ,ये तत्व सूर्या से ही प्राण को ग्रहण करते हैं ,तभी उनमे जीवन की उपस्थिति हो पाती है. अब ये साधक के ऊपर निर्भर करता है की वो उपरोक्त सप्त शक्तियों का (जो की सूर्य से ही प्राणों का शोषण करते हैं और तदनुरूप साधक को दैदिप्यता और तेजस प्रदान करते  ) कितना तीव्र प्रयोग कर पाता है. सबसे पहले ये समझ लेते हैं की वास्तव में ये सप्तर्षि हैं कौन कौन से और ये किन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
वशिष्ट  -  अग्नि तत्व – विवेक शक्ति
विश्वामित्र  - आकाश तत्व – इच्छा शक्ति
भारद्वाज  - चेतन तत्व – संकल्प शक्ति
गौतम  - वायु तत्व – विचार शक्ति
जमदग्नि  - तेज तत्व – क्रिया शक्ति
अत्री – जल तत्व – वाणी शक्ति
कश्यप  - पृथ्वी तत्व – उत्थान शक्ति
  वास्तव में ये सप्तर्षि ही मानव के वे सात शरीर या ब्रम्हांड के वे सात लोक हैं, जिन्हें भू,भुवः, स्वः मन:, जनः,तपः और सत्य लोक कहा गया है . ये मानव शरीर में उपस्थित वो सात सम्भावनाये हैं की यदि इन्हें कोई चैतन्य कर ले ,फिर उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं रह जाता है. वस्तुतः मानव शरीर में उपस्थित चेतना की ये सात परते ही हैं. जो किसी भी असाध्य को साध्य कर देती हैं. और एक बात हृदयंगम करने योग्य है की यदि तंत्र का आश्रय लिया जाये तो निश्चित ही ,चेतना के इन सातो स्तर की प्राप्ति सहज हो जाती है. वस्तुतः सूर्य विज्ञानं के जिज्ञासुओं को या साधकों को  इस रहस्य को आत्मसात कर सिद्ध हस्त प्राप्त करने के लिए तो पूरा एक साधना क्रम ही संपन्न करना पड़ता है. परन्तु सामान्य क्रम अपनाकर भी हम कुंडलिनी के चक्रों को ना ही सिर्फ स्पंदित कर सकते हैं, अपितु सप्त ऋषियों की चेतना का ये स्पंदन आप अपने जीवन में उतार कर अपना भाग्य स्वतः ही लिख सकते हैं, और दुर्भाग्य को पूरी तरह मिटाकर एक सौम्यता और तेजोमयता की प्राप्ति कर सकते हैं.
किसी भी रविवार से इस साधना को आप प्रारंभ कर सकते हैं और प्रातः काल स्नान कर सूर्य को जब जल समर्पित करे तो उसके पहले जल पात्र की और दृष्टि रख कर निम्न मंत्र का १०८ बार उच्चारण करे, इसके बाद ही सूर्य को “ॐ तेजस्विताय नमः” कहकर जल अर्पित करे या अर्घ्य चढ़ाये –
मूल मन्त्र-ॐ सूर्य सूर्याय सूर्य सप्तर्षिभ्यो सह चैतन्य प्राप्तुम पूर्ण तेजस्विताय नमः II
वस्तुतः ये मन्त्र इस रूप में गुंथा हुआ है की यदि इसका उपरोक्त विधान से नित्य प्रति प्रयोग किया जाये तो निश्चित ही इसका प्रवाह आपके दुर्भाग्य को पूर्ण रूपेण दूर कर सकता है 

****NPRU**** 

3 comments:

MUKESH SAXENA said...

bahut saral,durlabh aur adbhut sadhna hai aur gopniya bhi.humne pehle iske baare mein nahin suna. vastav mein ye manav jivan ke utthaan ke liye mahatvapoorn sadhna hai.jai sadgurudev

ज्योतिष विद्या said...

kya bina guru dikha ke v shadna kar sakte hai.

TANTRA said...

nothing else can be said except................. brilliant