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Saturday, June 9, 2012

Panch Tatva Sadhan Prayog-पञ्च तत्व साधन प्रयोग-


सृष्टि का आधार है पञ्च तत्व जिनसे इसका निर्माण हुआ,और इन्ही तत्वों से मनुष्य भी निर्मित हुआ है.परन्तु जो भी विकृति हमारे देह में होती है या जीवन में होती है,उसका कारण क्या हमने जानने की कोशिश की है नहीं न.... हमें तो मात्र यही लगता है की लो बीमार हो गए तो अब चलो डाक्टर के पास,लेकिन ये कोई समाधान नहीं है.क्यूंकि वो उस तत्व की पूर्ती नहीं कर सकता है. यदि चेहरे पर धूमिलता छाई हो, आकर्षण क्षमता की कमी हो गयी हो, मोटापा या दुबलापन आ गया हो,ऑफिस में परिस्थितियां अनुकूल नहीं रह रही हो,पति या प्रेमी,प्रेमिका या पत्नी से सम्बन्ध ठीक नहीं रह पा रहे हो  तो इसका सीधा अर्थ होता है की अग्नि तत्व न्यून हो गया है. क्यूंकि समस्त आकर्षण का आधार है अग्नि तत्व.यदि घर में धन नहीं रुक रहा हो,काम बिगड रहे हो,खून पतला हो गया हो.स्वप्न दोष हो रहा हो,गर्भ नहीं ठहर रहा हो.वीर्य पतला हो गया हो,या शुक्राणुओं की संख्या कम हो गयी हो तो ,ये सभी विकृतियाँ जल तत्व से सम्बंधित होती हैं.इस प्रकार जीवन की सभी स्थिति के लिए इन तत्वों की विकृति ही उत्तरदायी है.यहाँ पर मैं इन दो तत्वों की ही जानकारी दे रहा हूँ,क्यूंकि ये एक वृहद विज्ञानं है जिसकी परते यहाँ उधेडना उचित नहीं है. आपको क्या लगता है की इन तत्वों में विकृति क्यूँ होती है? क्या ये कोई शारीरिक दोष है? नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है  बल्कि हमारे सामान्य जीवन के कर्म और हमारा संचित कर्म इसके लिए उत्तरदायी है. जैसे यदि व्यक्ति व्यर्थ में जल का नाश करता हो या अपव्यय करता हो तो उसे जल से सम्बंधित विकृतियों का सामना करना ही पड़ेगा.इसी प्रकार जो व्यक्ति प्राणी मात्र को भोजन नहीं करवा सकता,ऊर्जा का अपव्यय करता रहता है ,हमेशा क्रोध मुद्रा में रहता हो ,उसे अग्नि तत्व की विकृति के दुष्परिणाम भुगतने ही पड़ते हैं. क्यूंकि हमारे शरीर में सर्वाधिक ऊर्जा आँख,कान और हमरे जननांगों से ही निसृत होती है.इसलिए ध्यान का अभ्यास किया जाता है. और ध्यान की अवस्था में आँखे अर्धोन्मीलित रहती है,श्रवण शक्ति को शुन्य कर दिया जाता है ताकि ऊर्जा का अपव्यय ना हो,यहाँ मैं कोई कपोल कल्पना पर बात नहीं कर रहा हूँ.आप स्वतः ही निम्न साधना को करके देखिये.परिणाम आपके समक्ष ही होगा. हमें प्रकृति ने सभी तत्वों की निर्धारित मात्रा प्रदान की है,और वो भी संतुलन बनाये रखने के लिए ,अब जब हम उसका अपव्यय करेंगे तो वो बह्यागत ही अपव्यय नहीं होते हैं अपितु आंतरिक रूप से भी उनमे विकृति आना स्वाभाविक है.क्यूंकि हमारे जिन कर्मों से बाह्य जगत प्रभावित होता है उसका उतना ही प्रभाव हमारे आंतरिक जगत पर भी पड़ता है. जब भी आप उपरोक्त स्थितियों का सामना कर रहे हों तो एक बार जरुर चिंतन कीजियेगा की कब हमने अग्नि या जल का अपव्यय किया है बर्बादी की है. आपको खुद समझ में आ जायेगा की गलती कहाँ हुयी हैं. और जो भी इन स्थितियों को अनुकूल करना चाहे वो.निम्न प्रयोगों को करके देख ले.पर इसका ये अर्थ भी नहीं है की परिस्थिति अनुकूल होते ही फिर हमने तत्वों का अपव्यय प्रारंभ कर दिया.क्यूंकि एक बात हमेशा याद रखिये, भूल की माफ़ी संभव है.अपराध की नहीं.नीचे मैं मात्र अग्नि और जल तत्व को संतुलित करने का विधान बता रहा हूँ. कायाकल्प तंत्र का ये बहुत महत्वपूर्ण भाग हैं.इन्हें नकारना बुद्धिमत्ता तो कदापि नहीं कहा जा सकता.
अग्नि तत्व के संतुलन को बनाये रखने के लिए प्रातःकाल स्वच्छ वस्त्र धारण कर तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित कर ,उस दीपक को इतनी ऊँचाई  पर स्थापित कर ले की आपकी नजर उसकी लौ पर सीधी पड़े. अब उस लौ को स्थिर आसन और चित्त से देखते हुए निम्न मंत्र का जप करे ,ये क्रम नित्य २४ मिनट तक होना चाहिए और ११ दिनों का यह क्रम है.एक बात ध्यान रखियेगा की जब भी नेत्रों में जलन होने लग जाये तब आँखे बंद कर ले और जप के पश्चात अंको को गुलाब जल मिश्रित शीतल जल से अवश्य ही धो ले. ये प्रयोग दिखने और पढ़ने में आसान है परन्तु इसका प्रभाव अचूक है,ये हम सभी पर सदगुरुदेव की असीम कृपा है जो ऐसा ज्ञान हम सभी के सामने आया है.
मंत्र -ॐरं पूर्ण तुष्ट्ये त्वं प्रतिकात्मकम पूर्ण आरोग्य सौभाग्य  देहि दापय में नमः   
यदि जल तत्व से सम्बंधित विकृतियों के कारण समस्याओं का सामना करना पद रहा है.तो ऐसे  शंख में जिसमे २५० मिली लीटर जल आ जाता हो को लेकर प्रातः काल उपरोक्त अनुसार ही स्नानादि कर के स्वच्छ वस्त्र धारण कर.सामने बाजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर उस पर शंख स्थापित कर दे.कैसा भी शंख हो सकता है.और उस शंख को जल से भर दे और प्रतिदिन ३० मिनट तक नित्य १४ दिनों तक निम्न मंत्र को करे.जप के बाद उस जल को या तो उसी दिन बहते हुए साफ़ जल में प्रवाहित करदे या साधना समाप्त होने के ७ दिनों के भीतर.जप काल में उस शंख पर ही ध्यान केंद्रित करना ही. जप काल में दीपक प्रज्वलित नहीं करना है. जीवन की शारीरिक और भौतिक समस्याओं का समाधान आपके सामने होगा.
मंत्र- ॐवारिः वारिः परिमार्जय वज्र रूपेण पूर्ण स्थायित्व प्रदातुव्यम वरुणाय नमः
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Five elements are the base of any creativity. And from this only human is created. But whatever defects happened in our body or in life, have we ever went to find out the reason behind it? I guess answer is ‘NO’… We always felt that if we are ill then we must see the doctor. But this is not the solution. Because he can’t fill up the gap of lack of that element. If  our face goes dull, lack of attractiveness, fatness or over slim, office environment is against us, unsatisfactory relationship with companion then all this directly relates to lack of fire element. Because base of every type of attraction- fire element. If unstable wealth, work failure, thinness in blood, nightfall, misconception, thin sperms, sperm count less, all these are related to water element. So for such type of defects in life only water element is responsible. Here I am giving only information related to these two elements only. As this is very broad science whose layers should be not open here. What do think as whats the reason behind such defectiveness in such elements? Are they any physical faults? No this is not at all like that… Rather our day today carry outs and work savings are responsible for it. Like individual waste water or misuses it then he will get defects related to water element. Likewise anyone who even can’t feed any one, wastes energy, always stays in angry mudra, so they suffers with fire element diseases. As form our body eyes, nose, ears and all genital organs releases energy. Therefore meditation is being practiced out. In such state eyes are half closed half opened. Hearing capacity becomes zero so that energy is not wasted. Here I am not talking just fake. You only experience the below sadhna and result will be infront of you. Nature has delegated required amount of all elements and that to be for balancing, now
And when expend it in outer form,its not just affect us in outer rather in inner way also.
However as our outer world is influenced so as inner world too in same quantity. 
Whenever you face similar situation in your life the please rethink the above lines that when we wasted water or fire element recently. Automatically you will come to know your fault. And whosoever wants to rectify this situation can attempt this process. But it doesn’t mean that whenever condition gets normal we again start such bad behavior. Because fault can be forgive but crime cannot. Below I am giving you the balancing of fire and water element. Its very significant chapter of rejuvenation. Rejecting it will not be a wise decision.
To maintain the balance in fire element light the sesame oil lamp with fresh clean cloths. Place it exactly at such position so as your eyesight will clash direct in straight line. With still mind and eyesight chant the following mantra. It should be done continuously for 24 mins. And consecutively 11 days. Plz mind whenever you feel like irritation in eyes just close it.And after completeing the mantra jap wash the eyes with rose water. This experiment seems light while reading but its results are faultless. All this is great blessings of sadgurudevji upon us as such divine knowledge is in our lap.
Mantra _ Om ram purna tushtye tvam pratikatmakam purna aarogya saubhagya dehi daapay me namah.

If one is facing complications related to water element defects then, take shankh which can contail 250 ml water in it. Take it in morning similarly above stated after taking shower place white cloth on small table and place that shankh on it. Shankh can be of any type. And fill it with water. And every day for 30 mins, 14 consecutive days chant the below mantra. After jap throw that water into any flowing water within 7 days of sadhna.. In the process just concentrate on that shankh only. Don’t flame lamp while this experiment. Life’s physical and materialstic problem’s solution will be infront of you..

Mantra – Om vaari vaari parimarjaya vajra rupen purna sthaitva pradaatuvyam varunay namah.

****NPRU****

1 comment:

MUKESH SAXENA said...

bahut hi durlabh aur mahatvapoorn sadhna di hai bhaiyya,but aapse anurudh hai ke kam se kam vayu tatva se related sadhna aur dein,plz..............kyonke aajkal vaayu rog sabse jyada hote hain.